हेलमेट की मांग में 25% की बढ़ोतरी
कलेक्टर आशीष सिंह द्वारा जारी आदेश के बाद शहर की हेलमेट दुकानों पर भीड़ बढ़ गई है। छोटी ग्वालटोली सहित कई क्षेत्रों में लोग हेलमेट खरीदने के लिए पहुंच रहे हैं। दुकानदारों के अनुसार, सामान्य दिनों की तुलना में ग्राहकों की संख्या में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हालांकि, बिक्री मात्र 10 प्रतिशत ही बढ़ी है। विक्रेताओं का कहना है कि अधिकतर लोग जानकारी लेने या सस्ते विकल्प देखने आते हैं, लेकिन खरीदारी कम कर रहे हैं।
बाजार में स्टाइलिश और तकनीकी हेलमेट्स की मांग
आज के समय में हेलमेट केवल सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि स्टाइल और तकनीक का प्रतीक भी बन गए हैं। स्पोर्टी लुक, ड्यूल वाइजर, इनबिल्ट सनवाइजर, ब्लूटूथ कनेक्ट जैसे फीचर्स से लैस हेलमेट्स युवाओं को खासा आकर्षित कर रहे हैं। वहीं, बुजुर्ग वर्ग हल्के और साधारण डिज़ाइन को प्राथमिकता दे रहे हैं। महिलाएं अब हेयर-फ्रेंडली और कॉम्पैक्ट साइज वाले हेलमेट को पसंद कर रही हैं।
लोकल हेलमेट से बढ़ सकता है खतरा
दुकानदारों का कहना है कि लोकल हेलमेट दिखने में तो असली जैसे होते हैं लेकिन सुरक्षा में फेल हो जाते हैं। एक्सीडेंट के वक्त यह सिर की रक्षा नहीं कर पाते और उल्टा नुकसानदायक हो सकते हैं। विशेषज्ञों की मानें तो कम से कम ISI मार्क वाला हेलमेट ज़रूर खरीदना चाहिए।
भोपाल में दिखी लापरवाही
जहां इंदौर में प्रशासन सख्ती से अभियान को लागू कर रहा है, वहीं भोपाल में इसकी शुरुआत से पहले ही मुहिम की गंभीरता पर सवाल उठने लगे हैं। नवदुनिया की टीम ने 31 जुलाई को भोपाल के कई पेट्रोल पंपों का निरीक्षण किया और पाया कि अधिकांश पेट्रोल पंपों पर बिना हेलमेट के पेट्रोल दिया जा रहा था। सिर्फ “हेलमेट नहीं तो पेट्रोल नहीं” जैसे पोस्टर चिपकाकर खानापूर्ति की जा रही थी।
जनता की मानसिकता में बदलाव ज़रूरी
इस पूरे अभियान की सफलता सिर्फ प्रशासन की सख्ती से नहीं, बल्कि आम जनता की सोच में बदलाव से ही संभव है। हेलमेट पहनना कानून का डर नहीं, बल्कि खुद की सुरक्षा के लिए आदत बननी चाहिए। हेलमेट विक्रेता संतोष कुमार कहते हैं, “जब तक पुलिस सख्ती नहीं करती, बिक्री में बड़ा उछाल नहीं आता। नियम का पालन तभी होता है जब लोग स्वयं समझदारी दिखाएं।”
निष्कर्ष:
“हेलमेट नहीं तो पेट्रोल नहीं” अभियान सड़क सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इंदौर में इसका असर दिखने लगा है, जबकि भोपाल को अभी सख्ती और जागरूकता की ज़रूरत है। समय आ गया है कि हम हेलमेट को बोझ नहीं, ज़रूरत समझें—क्योंकि जान है तो जहान है।
रिपोर्ट- विशाल कुमार